अहम भाव क्या है? 

अहम भाव का अर्थ

अहम भाव किसे कहते हैं ? 

ऐसा क्यों कहा गया है कि अहम को त्यागे बिना मोक्ष पाना संभव नहीं है। 

श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि हम यह शरीर नहीं है हम शुद्ध आत्मा है। 

आत्मा इस शरीर में निवास करती है। आत्मा मृत्यु के बाद शरीर त्याग कर अपने आगे के सफर पर निकल जाती है। आगे का सफर क्या है यह मनुष्य नहीं जानता इसीलिए उसका कोई व्याख्यान नहीं किया जा सकता । 

जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद आत्मा नए शरीर को धारण करती है नए रूप में जन्म लेती है। 

शरीर मरता है पर आत्मा कभी नहीं मरती वह अमर है।

अहम भाव क्या है ?

अहम भाव आत्मा से बिल्कुल विपरीत है । आत्मा ह्रदय में निवास करती है । किसी व्यक्ति की बुद्धि या मन में अहम भाव रहता है ।

यह अहं भाव यह बताता है कि हम शरीर हैं। इसीलिए यह अहम भाव हमें शरीर को सजाने संवारने,  इस रक्षा करने और भौतिक संसार के भोगों को भोगने की इच्छाओ की पूर्ति करने के लिए प्रेरित करता है।

जब हम कोई अच्छा काम करते हैं तो उससे हमारी आत्मा को बल मिलता है ।और जब हम कोई स्वार्थ पूर्ण काम करते हैं । दूसरों को दबाने के लिए, ताकत हासिल करने के लिए काम करते है, दूसरों से खुद को बेहतर बताने के लिए कोई भौतिक स्तर पर सफलता हासिल करने के लिए काम करते हैं। और उसे हासिल कर लेते हैं । तो हमारे अहं को उससे बल मिलता है।

आत्मा हमेशा कुछ अच्छा करना चाहती है । और अहम भाव हमेशा स्वार्थ की पूर्ति करना चाहता है ।

आत्मा हमेशा दुनिया संसार का भला चाहती है अपने आसपास वाले सभी लोगों को सुखी देखना चाहती है। पर अहम भाव सिर्फ खुद के सुख के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है ।

आत्मा को दूसरे का दुख देख कर भी दुख होता है ।और अहं भाव दूसरे को दुख देकर भी खुद सुख पाने की कोशिश करने के लिए प्रेरित करता है।

आत्मा मानती है कि संसार एक परिवार है ।और दूसरे को तकलीफ देकर हम खुद का भला नहीं कर सकते ।अहम भाव यह कहता है कि हम सब अलग हैं ।और हम दूसरे से ज्यादा शक्तिशाली हो सकते हैं । 

आत्मा सभी प्राणियों को, जीवो को, मनुष्यों को एक समान देखती है । अहं भाव जात पात , छोटा बड़ा , गरीब अमीर , ऊंच-नीच का फर्क मानता है ।

आत्मा शुद्ध प्रेम का अनुभव करती हैं और शुद्ध प्रेम का प्रदर्शन करती है । लेकिन अहं भाव प्रेम को भी एक सौदे की तरह देखता है। और प्रेम के नाम पर भी ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने की और ज्यादा से ज्यादा फायदा पाने की कोशिश करने के लिए प्रेरित करता है।

आत्मा का परमात्मा से मिलन हो सकता है लेकिन केवल तब जब वह शुद्ध हो । जब तक इंसान के अंदर अहं भाव है वह आत्मा को शुद्ध नहीं होने देता और आत्मा का परमात्मा से मिलन नहीं होने देता।

इसीलिए कहा क्या है कि अहं को त्यागे बिना मुक्ति संभव नहीं है।

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