दहेज प्रथा सर्वथा बेबुनियाद तर्कों पर आधारित है. मगर लालच और मजबूरी के खम्बो पर आज भी समाज मे टिकी हुई है. • dowry is an evil still prevailing in our society •
समाज मे हमेशा से दहेज प्रथा का प्रचलन रहा है ।
दहेज मतलब जब लड़की के माता-पिता लड़की को ब्याहते हैं, जब उसको लड़के वालों के यहां भेजते हैं उसके साथ नकदी जेवर और कीमती सामान भी भेजते हैं ।
दहेज लेना और देना कानूनन अपराध है ।
यूं तो दहेज लेना और देना दोनों ही कानूनन अपराध है । मगर आज भी कोई भी व्यवस्था विवाह arrange marriage करता है , तो दहेज के बिना ऐसी अरेंज मैरिज होना लगभग असंभव है ।
लेन-देन के नाम के पीछे छुपा दहेज :
लेन देन तो शादी का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं ।
पुराने जमाने में शायद लोग ऐसा मानते होंगे कि बेटी ससुराल में जाएगी । ब्याह के बाद बेटी की जिम्मेदारी ससुराल वालों की हो जाएगी । तो शायद इसलिए एकमुश्त रकम , कीमती सामान देकर जीवन भर के लिए बेटी को उसके ससुराल वालों को सौंप देते होंगे, और आज के जमाने में भी तभी से यह दहेज प्रथा चलन में रही होगी ।
बेबुनियाद तर्को पर पूरी तरह से आधारित :
एक बार मैंने किसी से पूछा कि दहेज क्यों जरूरी है शादी में?
तो उसने कहा कि अब लड़की लड़के के घर वालों के यहां रहेगी । और जीवन भर वही उसका खर्चा उठाएंगे इसीलिए लड़की के मां-बाप का दहेज देना भी जरूरी है।
कुछ लोगों से मैंने पूछा कि कोई लड़का क्यों दहेज लेना चाहता है ?
तो उनका जवाब था कि जब उसके दोस्तों को शादी में दहेज मिलता है, जब उसके भाइयों को शादी में दहेज मिलता है, तो स्वाभाविक है उसकी भी इच्छा होगी कि उसको भी शादी में दहेज मिले।
लड़के दहेज को मानते हैं स्टेटस सिम्बल :
समाज में लड़के भी दहेज ज्यादा मिलने को अपना एक स्टेटस सिंबल के रूप में देखते हैं ।
कहीं ना कहीं ऐसा समझते हैं कि जिस लड़के को जितना ज्यादा दहेज मिलता है उसकी वैल्यू उतनी ही ज्यादा होती है।
दहेज बन चुका है वैल्यू सिस्टम:
तू शादी में दहेज सिस्टम एक किस्म का वैल्यू डेटरमिनेशन सिस्टम value determination system सिस्टम बन चुका है।
जो लड़कों की वैल्यू एस्टैब्लिश करता है और उसी हिसाब से लड़की वालों को लड़के की वैल्यू के हिसाब से दहेज देना पड़ता है ।
लड़कियाँ भी टेक देती हैं घुटने इस अपराध के सामने मानकर इसे अपना वैल्यू इंक्रीसिंग सिस्टम :
कई बार तो जब लड़कियों से पूछा जाता है । कि दहेज लेना देना सही है कि नहीं ।
तो वह भी मानती हैं कि जितना ज्यादा दहेज वह अपने ससुराल में लेकर जाएंगी, उतनी ही ज्यादा ससुराल में इज्जत पाएंगी । तो उनके भी लिए दहेज देना एक स्टेटस की बात होती है।
ये दहेज का सिस्टम नही मानता की लड़की की है कोई वैल्यू :
कमाल की सोचने वाली बात यह है कि दहेज प्रथा मे कहीं भी शादी में लड़की की कोई वैल्यू नहीं मानी जाती है ।
जिस लड़की के पिता जितना ज्यादा दे सकते हैं उतनी ही मान ली जाती है लड़की की वैल्यू ।
लड़की के मां-बाप को नहीं मिलता कोई दहेज:
लड़की के मां-बाप को दहेज के रूप मे कभी किसी भी प्रकार की कोई रकम नहीं दी जाती है जबकि लड़की के मां-बाप अपनी लड़की किसी और को सौंप रहे होते हैं यानी कि दहेज सिस्टम में लड़की की कोई वैल्यू नहीं है।
बेटे को देखते हैं एक प्रॉपर्टी की तरह:
एक तरीके से देखा जाए तो दहेज लोभी परिवार मे लड़के के माता पिता अपने बेटे को एक प्रॉपर्टी के रूप में देखते हैं जिसे वह ऊंचे से ऊंचे दामों में बेचना चाहते हैं।
प्रेम विवाह की मुसीबत दहेज :
आज भी कई बार अगर कोई लड़का प्रेम विवाह कर लेता है , तो लड़के के मां-बाप उस लड़की को ज्यादातर इसलिए नहीं स्वीकारते हैं, क्योंकि लव मैरिज में उन्हें किसी प्रकार का कोई दहेज नहीं मिला होता है ।
दहेज लोभियों के लिए लड़की की काबिलियत और गुणों का कोई मोल नहीं:
लड़की कितनी भी काबिल क्यों ना हो , उनको इस बात से कोई मतलब नहीं होता है । ज्यादातर ऐसा देखा जाता है कि दहेज के बिना लड़की को स्वीकारना लड़के के परिवार वालों को नागवार गुजरता है।
सोशल कंडिशनिंग ( social conditioning) :
ऐसे दहेज लोभी मांसिकता वाले लोग हमेशा से ही बेटे के मन में ऐसी कंडीशनिंग करते है , कि उसे पता होता है , उसकी वैल्यू उतनी ही होगी जितना उसका दहेज आएगा।
अभी भी है पूरी तरीके से प्रचलन में दहेज प्रथा:
कहने को तो गैर कानूनी है दहेज लेना और देना और इसे खुले मुँह कोई लेना देना करता भी नहीं है ।
मगर फिर भी यह दहेज प्रथा जमाने में लेनदेन और तोहफों के नाम समाज मे पाँव जमाये है ।
दहेज : एक पक्ष की लालच और दूसरे पक्ष की मजबूरी पर आधारित प्रथा :
दहेज के पक्ष में दिए जाने वाले किसी भी तरीके के तर्क बिल्कुल ही बेबुनियाद और लालची सोच का नतीजा है ।
लड़के वाले दहेज लालच के कारण और समाज में अपना स्टेटस बढ़ाने के लिए लेते हैं। और लड़की वाले दहेज अपनी इज्जत बचाने के लिए और मजबूरी में देते हैं।
लड़की कभी नहीं होती एक बोझ :
आज के जमाने में कोई भी लड़की किसी मां बाप के लिए बोझ नहीं होती मगर फिर भी शादी करना तो स्वभाविक है।
बेटी के सुखद भविष्य के लिए लड़की के माँ बाप देते हैं दहेज:
अपनी बेटी को अकेले छोड़ ना किसी भी मां-बाप की इच्छा नहीं होती इसलिए शादी तो करनी ही है। और मजबूरी वश दहेज तो उन्हें देना है ।
अगर वह इस दहेज को स्वेच्छा से भी देते हैं तो भी यह किसी भी तरीके से एक सही कारण नहीं है।
बेटी पैदा होते ही दहेज की चिंता भी साथ होती है पैदा :
दहेज जैसी आपराधिक मानसिकता वाली प्रवृत्तियों के कारण ही आज भी जब किसी के घर बेटी पैदा होती है तो वह यह सोचता है कि उसका बोझ बढ़ गया है ।
उसके शादी के लिए रकम जमा करनी है, उसके शादी के लिए पैसे जोड़ने पड़ेंगे। जीवन भर मेहनत करनी पड़ेगी ।
दहेज एक कुप्रथा :
दहेज जैसी कुप्रथा के कारण ही लड़कियाँ आज भी ज़माने में लोगों को बोझ लगती हैं ।
लड़की नहीं लेती शादी करने के लिए कोई कीमत:
जहां पर दहेज के पक्ष में यह तर्क दिए जाते हैं कि लड़की लड़के वालों के यहां आकर रहेगी और जीवन भर वही लड़का और उसके घर वाले उसका खर्चा उठाएंगे , ऐसे तर्क देने वालों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वही लड़की जीवन भर उनके काम करेगी उनका ख्याल रखेगी , उनके घर के बच्चे पैदा करेगी और इसके लिए वह या उसके मायके वाले लड़की के पति या ससुराल से किसी प्रकार की कोई कीमत नहीं लेते हैं ।
लड़की चाहे तो भी नहीं रहेगा लड़का आकर उसके घर पर , नहीं देगा दहेज :
और अगर दहेज केवल इसलिए लिया जा रहा है कि लड़की लड़का और लड़के वालों के यहां के रहेगी तो अगर लड़के वाले हिम्मत करें और इस प्रथा को बदल दें, वह दहेज दे , और अपने लड़के को लड़की वालों के यहां भेज दें तो शायद लड़की वाले खुशी-खुशी अपने यहाँ उसे रख लेंगे ।
लड़की वालों का दिल होता है बड़ा :
कोई लड़के के मां-बाप ऐसा कभी नहीं करेंगे इसलिए तर्क भी बिल्कुल बेबुनियाद है। लड़की वालों का दिल बहुत बड़ा होता है जो खुशी खुशी अपनी बेटी को अपने यहाँ से विदा करते हैं ।
दहेज का आधार- लालच :
दहेज प्रथा पूरी तरीके से लालच जनित है.। यह केवल एक सामाजिक बुराई नहीँ है बल्कि एक मानसिक कुटिलता और आपराधिक मानसिकता का भी प्रतीक है।
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